भुवनेश्वर, जागरण संवाददाता। विश्व के एकमात्र समृद्ध संस्कृति संपन्न देश भारत ही है, जहां के ओडिशा राज्य के पुरी धाम में अनादिकाल से विराजमान हैं श्री जगन्नाथजी। वे पुरी जगन्नाथ मंदिर के रत्नवेदी पर चतुर्धा देवविग्रह के रुप में दर्शन देते हैं। वे कलियुग के एकमात्र पूर्ण दारुब्रह्म भी हैं। वे विश्व को शांति, एकता तथा मैत्री का पावन संदेश देते हैं। उनकी प्रतिवर्ष आषाढ शुक्ल द्वितीया को अनुष्ठित होने वाली विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा एक सांस्कृतिक महोत्सव होता है। वह दशावतार यात्रा होती है। गुण्डिचा यात्रा होती है। जनकपुरी यात्रा होती है। वह घोष यात्रा होती है।
वास्तव में वह पतितपावनी यात्रा होती है। वह नव दिवसीय यात्रा होती है। भगवान जगन्नाथजी की विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा के लिए प्रतिवर्ष तीन नये रथों का निर्माण होता है जो जगन्नाथ मंदिर के समस्त रीति-नीति के साथ वैशाख मास की अक्षय तृतीया के पावन दिवस से आरंभ होता है। निर्माण की अत्यंत गौरवशाली सुदीर्घ परम्परा है। इस पावन कार्य को वंशानुक्रम से सुनिश्चित बढईगण ही करते हैं। यह कार्य पूर्णतः शास्त्रसम्मत विधि से संपन्न होता है।
क्या कहना है रथनिर्माण विशेषज्ञों का
रथनिर्माण विशेषज्ञों का यह मानना है कि तीनों रथ, बलभद्रजी का रथ तालध्वज रथ, सुभद्राजी का रथ देवदलन रथ तथा भगवान जगन्नाथ जी का रथ नंदीघोष रथ का निर्माण पूरी तरह से वैज्ञानिक तरीके से होता है। रथ-निर्माण में कुल लगभग 205 प्रकार के अलग-अलग सेवायतगण सहयोग करते हैं। प्रतिवर्ष वसंतपंचमी के दिन से रथनिर्माण के लिए काष्ठ संग्रह का पवित्र कार्य आरंभ होता है। जिस प्रकार पंचतत्वों से मानव-शरीर का निर्माण हुआ है, ठीक उसी प्रकार काष्ठ, धातु, रंग, परिधान तथा सजावट आदि की सामग्रियों से रथों का पूर्णरुपेण निर्माण होता है। पौराणिक मान्यता के आधार पर रथ-यात्रा के क्रम में रथ मानव-शरीर, रथि मानव-आत्मा, सारथी-मानव-बुद्धि, लगाम मानव-मन तथा रथ के घोड़े मानव-इन्द्रीयगण के प्रतीक होते हैं। तीनों ही रथ उस दिन चलते-फिरते मंदिर होते हैं।






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